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मार्च माह मे खिलने वाले फ्यूंली के फूलो का जनवरी माह मे खिलने से हो रहे जलवायु परिवर्तन से पर्यावरणविद खासे चिन्तित

लक्ष्मण सिंह नेगी

ऊखीमठ। केदार घाटी के खेत – खलिहानो मे मार्च माह के दूसरे सप्ताह मे खिलने वाले फ्यूंली के फूलो के जनवरी माह के तीसरे सप्ताह मे खिलने से पर्यावरणविद खासे चिन्तित है। फ्यूंली के फूलो के जनवरी माह मे खिलने पर कोई जलवायु परिवर्तन मान रहे है तो कोई प्रकृति के साथ मानवीय हस्तक्षेप। भले ही निर्धारित समय से दो माह पूर्व फ्यूंली के फूल खिलने का कारण कुछ भी हो मगर दिसम्बर से लेकर फरवरी माह तक बर्फबारी से लदक रहने वाले खेत – खलिहानो मे जनवरी माह मे फ्यूंली के फूल खिलना भविष्य के लिए शुभ संकेत नही है। दो दशक पूर्व की बात करे तो चैत्र मास के आगमन पर फ्यूंली व बुरांस के फूल खिलते दिखाई देते थे। फ्यूंली का फूल बसन्त आगमन व ॠतु परिवर्तन का ध्योतक माना जाता था तथा चैत्र मास आगमन पर नौनिहाल घरो की चौखटो मे ब्रह्म बेला पर फ्यूंली , बुरांस सहित अनेक प्रजाति के पुष्पो को बिखेर कर बसन्त आगमन के सन्देश देने की परम्परा युग – युगान्तरो से लेकर आज भी जीवित है। फ्यूंली के फूल की महिमा व सुन्दरता की महिमा का गुणगान गढ़ गौरव नरेन्द्र सिंह नेगी ने भी बडे मार्मिक तरीके से किया है जबकि संगीतकारो, साहित्यकारो व चित्रकारो ने भी फ्यूंली के फूल की महिमा को जन – जन तक पहुंचाने मे अहम योगदान दिया है। फ्यूंली के फूल के निर्धारित समय से पूर्व खिलने से पर्यावरणविद खासे चिन्तित है, उनका कहना है प्रकृति के साथ निरन्तर मानवीय हस्तक्षेप होने तथा जलवायु परिवर्तन के कारण फ्यूंली निर्धारित समय से पूर्व खिल रही है जो कि भविष्य के लिए शुभ संकेत नही है। मदमहेश्वर घाटी रासी गाँव के शिक्षाविद भगवती प्रसाद भट्ट बताते है कि दो दशक पूर्व फरवरी माह तक अधिकांश खेत – खलिहान बर्फबारी से लदक रहते थे तथा मार्च महीने मे ही प्रकृति के साथ ही फ्यूंली के फूलो मे नव ऊर्जा का संचार देखने को मिलता था तथा मार्च महीने के दूसरे सप्ताह मे फ्यूंली का फूल पूर्ण यौवन पर रहता था। गुरिल्ला संगठन की जिलाध्यक्ष बसन्ती रावत ने बताया कि फ्यूंली का फूल बसन्त ॠतु आगमन का ध्योतक माना गया है तथा जनवरी मे फ्यूंली के खिलना भविष्य के लिए शुभ संकेत नही है। निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य परकण्डी रीना बिष्ट ने बताया कि कुछ समय पूर्व जब धियाणिया चैत्र महीने मे मायके जाती थी तथा मायके से ससुराल विदा होते समय खेत – खलिहानो व पैदल रास्तो के दोनो किनारो खिली फ्यूंली हमेशा मायके की याद दिलाती थी। जनवरी माह मे फ्यूंली का खिलना भविष्य के लिए शुभ संकेत नही है तथा प्रकृति के साथ मानवीय हस्तक्षेप बन्द नही हुआ तो भविष्य मे गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ सकते है।

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