बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ही फूलदेई पर्व की हुई शुरुआत

बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ही बाल पर्व फूलदेई की हुई शुरुआत
रुद्रप्रयाग/ केदारघाटी। शिशिर ऋतु के समाप्त होते ही बसन्त के आगमन पर चैत्र की संक्राति के दिन से ही बाल पर्व फूलदेई की शुरुआत हो गई है।
बसन्त के आगमन पर जब प्रकृति रंग बिरंगे फूलों , धरती हरियाली से सुसज्जित वृक्षों को नव जीवन दान कोंपली रूप ले लेती है, मन प्रफुल्लित हो उठता है। प्राणी मात्र में खून का बहु संचार होने लगता है।
वहीं चैत्र की संक्राति के दिन से ही लोक पर्व फूलदेई को मानने की शुरुआत हो जाती है। यह त्योहार पहाड़ों में ही नही अपितु सम्पूर्ण देश मे अलग अलग परम्पराओं अनुसार मनाया जाता है। 
बता दें कि पहाड़ों में बच्चे इस दिन जंगलों से लाये बांज, बुरांस, फ्यूंली मोल सहित कई फूल पत्तों को एकत्रित कर प्रातः अपने गांव के प्रत्येक घरों के दरवाजों पर इन फूलों को डालते हैं साथ ही फूलदेई के गीत गाते हैं। जिसे घर आंगन में खुशियां आना माना जाता है। इसी तरह बच्चे सम्पूर्ण गांव में यह प्रक्रिया करते हैं इस दौरान बच्चों के पास डोली स्वरूप घोघा होता है, जिसे बच्चे अपने कंधों में रख कर पूरे गांव में घूमते हैं, इस दौरान ग्रामीण बच्चों को फल, गुड़ सहित पैसे देते हैं।
पहाड़ों में यह पर्व आठ दिनों तक मनाया जाता है, वहीं कही इसे एक माह तक भी मनाने की परंपरा है।
पहाड़ों में आठ दिनों तक यह पर्व मनाने के पश्चात बच्चे आठवें दिन फूलछोड़ा मनाते हैं, इस दिन पूजा के बाद गांव के सभी बच्चों को इकट्ठा भोजन करवाया जाता है।
इस पर्व को केदारघाटी के सभी गांवों में बच्चों द्वारा प्रातः फूल डालकर मनाया गया।
इस पर्व पर ब्लॉक प्रमुख उखीमठ श्वेता पांडेय ने कहा कि हमें अपनी प्राचीन परम्पराओं का निवर्हन इसी प्रकार करना चाहिए।
वहीं कनिष्क प्रमुख ब्लॉक उखीमठ शैलेन्द्र कोटवाल ने सभी बच्चों को फूलदेई पर्व की बधाई दी।
जिला पंचायत सदस्य त्रियुगीनारायण वार्ड बबिता सजवाण ने कहा कि गांव में बच्चों को आज भी जल्दी उठकर फूल डालते देखना अपनी परम्पराओं के प्रति उनका मोह दर्शाता है। हमें अपनी प्राचीन परम्पराओं को संजोना चाहिए।
बाल पर्व फूलदेई को विद्यालयों में भी धूमधाम से मनाया गया है।इस दिन विद्यालयों में बच्चों को इस पर्व की जानकारी दी जाती है।



