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कालीमठ घाटी के स्व राजेंद्र सिंह राणा का जीवन कुरुक्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को रहा समर्पित

कालीमठ घाटी के स्व राजेंद्र सिंह राणा का जीवन कुरुक्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को रहा समर्पित

रूद्रप्रयाग। कालीमठ घाटी के स्व राजेन्द्र सिंह राणा एक विद्वान पुरातत्वविद् एवं कुरुक्षेत्र की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के प्रति समर्पित एक सच्चे साधक थे। उनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति, पुरातात्विक शोध और कुरुक्षेत्र के विकास को समर्पित रहा। 28 जुलाई, 2025 को उनके आकस्मिक निधन से समूचे सांस्कृतिक, इतिहासकार जगत को एक अपूरणीय क्षति हुई है। उनके निधन पर  केदारघाटी एवं कालीमठ घाटी के जनमानस एवं जनप्रतिनिधियों ने शोक व्यक्त किया है

प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा संघर्ष का सफर

राजेन्द्र सिंह राणा का जन्म 19 फरवरी 1962 को उत्तराखंड के जनपद रूद्रप्रयाग में कालीमठ गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कालीमठ और विद्यापीठ में हुई थी। आर्थिक अभावों के बावजूद उन्होंने शिक्षा के प्रति अदम्य लगन दिखाई। जीवनयापन के लिए उन्होंने मजदूरी, केदारनाथ पैदल मार्ग में घोड़े-खच्चर चलाने जैसे कठिन कार्य भी किए, यहाँ तक कि दिल्ली की सड़कों पर भी श्रम किया। इन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से भूगर्भ विज्ञान और पुरातत्व में विशेषज्ञता प्राप्त की। जो उनके भविष्य की नींव बनी।

श्रीकृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र एक तपस्थली

जीवन में कठिन परिश्रम के बाद 1991 में श्रीकृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र से जुड़कर राजेन्द्र सिंह राणा ने अपनी सेवा यात्रा आरंभ की। इस दौरान उनके द्वारा पांडवों के जीवन गाथा पर लगातार शोध कर प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कुरुक्षेत्र की भूमि पर लेख लिख कई तथ्य प्रस्तुत किए। उनके इतिहास के शोध का सफर 2020 में संग्रहालयाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी नहीं थमा, वे लगातार कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड से जुड़े रहे और अपनी सेवाएँ निष्ठापूर्वक देते रहे। उनके लिए संग्रहालय कोई साधारण संस्था नहीं, बल्कि एक तपस्थली थी, जहाँ उन्होंने समय और स्वास्थ्य की परवाह किए बिना निरंतर कार्य किया।
उनकी सृजनशीलता और पुरातात्विक दक्षता के कारण श्रीकृष्ण संग्रहालय एक विचारोत्तेजक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने 48 कोस कुरुक्षेत्र का गहन सर्वेक्षण करके इसकी पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रामाणिकता का वैज्ञानिक शोध प्रस्तुत किया। उनके प्रयासों से यह सिद्ध हुआ कि यह भूमि वास्तव में महाभारत कालीन पांडवों और भगवान श्रीकृष्ण की कर्मस्थली है।

पुरातत्व और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

कुरुक्षेत्र के तीर्थ स्थलों को लेकर स्व राणा जी ने उन्हें मानचित्र में दर्शाने का कार्य कर भव्य प्रदर्शनियों, शोधपत्रों और शैक्षणिक संवादों के माध्यम से उन्हें जीवंत भी किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण कार्य भी किया गया।
साहित्य के प्रति उनका लगाव हमेशा रहा जिसको लेकर उन्होंने लेख भी प्रस्तुत किए। कॉफी टेबल बुक्स, शोधपरक पुस्तकें, प्रदर्शनी साहित्य, रेडियो नाटक, डॉक्यूमेंट्री स्क्रिप्ट और पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेखों ने भारतीय संस्कृति की विविधता और कुरुक्षेत्र के वैभव को जन-जन तक पहुँचाया।

पांडव लीला से बचपन से था जुड़ाव

राजेन्द्र सिंह राणा का पारिवारिक इतिहास भी पांडवों लीलाओं से जुड़ा रहा। उनके पिता स्वर्गीय जयसिंह राणा जो कि कालीमठ गांव के पूर्व प्रधान भी रहे थे तथा अपने गाँव में पांडवों के पूजा अनुष्ठान नृत्य में अर्जुन के पश्वा का किरदार निभाते थे वर्तमान में यह भूमिका उनके भतीजे द्वारा निभाई जाती है। संस्कृति , इतिहास और पुरातत्व के प्रति उनका लगाव एक पारिवारिक विरासत का हिस्सा था।

अंतिम समय तक समर्पण
राणा जी का कार्य उनकी अंतिम सांस तक जारी रहा। वे केदारनाथ क्षेत्र में पुरातत्व संरक्षण और ऐतिहासिक वस्तुओं के अभिलेखीकरण के लिए भी कार्य करना चाहते थे, किंतु यह इच्छा पूरी न हो सकी। 28 जुलाई, 2025 को वे अपनी कर्मभूमि कुरुक्षेत्र की माटी में समाहित हो गए।
उन्होंने निस्वार्थ भाव से कुरुक्षेत्र की सेवा की—न प्रतिष्ठा की चाह, न पुरस्कार की इच्छा। उनके कार्यों ने कुरुक्षेत्र को विश्व पटल पर एक अलग पहचान दिलाई। आज देश-विदेश से आने वाले पर्यटक जिस कुरुक्षेत्र को देखते हैं, उसके विकास में उनका योगदान अमूल्य है।
श्रीकृष्ण संग्रहालय और कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड उनके अविस्मरणीय योगदान को सदैव स्मरण करता रहेगा। उनके समाज में योगदान को लेकर कालीमठ घाटी ही नहीं अपितु केदारघाटी के जनमानस सहित जनप्रतिनिधियों ने सराहना की है।

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