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पहाड़ों में समय से पहले खिला बुरांस, जलवायु परिवर्तन के संकेत

रिपोर्ट/ लक्ष्मण सिंह नेगी।

पहाड़ों में समय से पहले खिला बुरांस, जलवायु परिवर्तन के संकेत और गहराए।

ऊखीमठ। पहाड़ों में इस वर्ष बुरांस के लाल फूल निर्धारित समय से काफी पहले खिलने लगे हैं। आमतौर पर मार्च–अप्रैल माह में घाटी की पहाड़ियों और वनों को लालिमा से भर देने वाला बुरांस इस बार जनवरी के अंत से ही पुष्पित होने लगा है। केदारघाटी व मदमहेश्वर घाटी के ग्रामवासियों, वनकर्मियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह दृश्य जितना मनोहारी है, उतना ही चिंताजनक भी माना जा रहा है। स्थानीय जानकारों के अनुसार बुरांस का समय से पहले खिलना सीधे तौर पर बदलते मौसम चक्र से जुड़ा है। इस सर्दी में निचले इलाकों सहित ऊँचाई वाले क्षेत्रों में अपेक्षित बर्फबारी नहीं हुई, वहीं दिन और रात के तापमान में भी सामान्य से अधिक वृद्धि दर्ज की गई। लंबे समय तक शुष्क मौसम बने रहने और ठंड की अवधि कम होने से बुरांस जैसे शीतोष्ण प्रजाति के वृक्षों के जैविक चक्र में बदलाव देखने को मिल रहा है। वनस्पति वैज्ञानिकों का मानना है कि बुरांस का फूलना तापमान, आर्द्रता और वर्षा के संतुलन पर निर्भर करता है। जब सर्दियों में ठंड पर्याप्त नहीं रहती और बसंत जैसी परिस्थितियां जल्दी बन जाती हैं, तो वृक्ष समय से पहले पुष्पन की ओर अग्रसर हो जाते हैं। यह बदलाव केवल बुरांस तक सीमित नहीं है, बल्कि फ्यूली, आड़ू, खुबानी और अन्य पर्वतीय वनस्पतियों में भी देखा जा रहा है।
पर्यावरणविदों के अनुसार यह स्थिति जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। समय से पहले फूल खिलने से परागण की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, क्योंकि उस समय परागण करने वाले कीट और पक्षी सक्रिय अवस्था में नहीं होते। इससे बीज उत्पादन, वनस्पति पुनरुत्पादन और आगे चलकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बुरांस केवल एक फूल नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, आस्था और आजीविका से भी जुड़ा है। इसके फूलों से पारंपरिक पेय, औषधियां और स्थानीय उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में इसके प्राकृतिक चक्र में आया असंतुलन भविष्य के लिए चेतावनी है। प्रोफेसर कविता भट्ट शैलपुत्री ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर गंभीरता से ध्यान देने, दीर्घकालिक मौसम अध्ययन, वनों के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि मदमहेश्वर घाटी जैसी संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखा जा सके। मदमहेश्वर घाटी के प्रगतिशील काश्तकार बलवीर राणा का कहना है कि एक दशक पूर्व बुरांस के फूल चैत्र मास के शुभारंभ अवसर तक अपने पूर्ण यौवन पर रहते थे मगर विगत एक दशक से जलवायु परिवर्तन के कारण बुरांस का फूल निर्धारित समय से पहले देखा जा रहा है जो कि भविष्य के लिए शुभ संकेत नही है । केदारघाटी के कृषक अशोक सेमवाल ने बताया कि केदारघाटी में समय से पूर्व बुरांस खिले नजर आ रहे हैं, जिस से प्रकृति का असंतुलन साफ दिखाई दे रहा है।

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