पिता की अंतिम विदाई में नहीं हो सके शामिल मध्य महेश्वर धाम के प्रधान पुजारी, धार्मिक संकल्प के कारण नहीं छोड़ा स्थान
रुद्रप्रयाग। द्वितीय केदार भगवान मध्यमहेश्वर धाम के प्रधान पुजारी शिवशंकर लिंग के लिए धर्म के प्रति लिया गया संकल्प इतना महत्वपूर्ण रहा कि पिता के निधन के बाद भी वह उनकी अंतिम विदाई में शामिल नहीं हो सके। एक ओर पिता के निधन का गहरा दुख था, तो दूसरी ओर भगवान मध्यमहेश्वर की छह माह की अनवरत पूजा-अर्चना का धार्मिक दायित्व। शिवशंकर लिंग ने व्यक्तिगत पीड़ा से ऊपर उठकर अपने संकल्प को निभाया और धाम में रहकर भगवान की सेवा जारी रखी।
कर्नाटक स्थित उनके पैतृक गांव चिकवेगवाड़ी में बीते मंगलवार को उनके पिता स्वर्गीय गुरुलिंग को भू-समाधि दी गई। अंतिम संस्कार में परिवार और बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी मौजूद रहे, लेकिन धार्मिक संकल्प के कारण पुत्र शिवशंकर लिंग धाम से बाहर नहीं आ सके। पिता को अंतिम विदाई न दे पाने का यह क्षण उनके लिए बेहद भावुक और पीड़ादायक रहा होगा, लेकिन उन्होंने भगवान की सेवा में अपने दायित्व को सर्वोपरि रखा।
मध्यमहेश्वर धाम के कपाट खुलने के बाद छह माह तक धाम में रहकर भगवान की नित्य पूजा-अर्चना और निर्धारित धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने की परंपरा है। इस परंपरा के तहत संबंधित पुजारी कपाट खुलने से लेकर कपाट बंद होने तक धाम में ही रहते हैं। केदारनाथ के रावल द्वारा केदारनाथ और मध्यमहेश्वर धाम के पुजारियों को चलविग्रह डोली के प्रस्थान से पूर्व ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में यह धार्मिक संकल्प दिलाया जाता है। इसी संकल्प के चलते शिवशंकर लिंग पिता के निधन के बावजूद धाम से बाहर नहीं आ सके।
शिवशंकर लिंग के पिता स्वर्गीय गुरुलिंग स्वयं भी धार्मिक परंपराओं और मंदिर सेवा के प्रति समर्पित रहे। उन्होंने करीब 40 वर्षों तक केदारनाथ, मध्यमहेश्वर समेत विभिन्न मंदिरों में पुजारी के रूप में सेवाएं दीं। कठिन हिमालयी परिस्थितियों के बीच उन्होंने लंबे समय तक भगवान की पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वहन किया। अब उनके पुत्र उसी धार्मिक विरासत और परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
पिता के निधन के बाद पुत्र का अंतिम संस्कार में शामिल होना भारतीय संस्कारों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में अंतिम विदाई के उस भावुक अवसर पर मौजूद न हो पाना शिवशंकर लिंग के लिए निश्चित रूप से अत्यंत कठिन रहा होगा। लेकिन उनके लिए भगवान की सेवा का लिया गया संकल्प व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर रहा।
केदारनाथ और मध्यमहेश्वर जैसे उच्च हिमालयी धामों में छह माह तक रहकर पूजा-अर्चना करना स्वयं कठिन तपस्या से कम नहीं है। विषम मौसम, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित सुविधाओं के बीच भी पुजारियों को धार्मिक परंपराओं का निरंतर निर्वहन करना पड़ता है। पिता के निधन जैसी व्यक्तिगत त्रासदी के बीच भी शिवशंकर लिंग का धाम में रहकर पूजा जारी रखना धर्म, आस्था, कर्तव्य और त्याग की भावुक मिसाल बन गया है।
एक ओर पिता की अंतिम विदाई थी और दूसरी ओर भगवान के प्रति लिया गया संकल्प। शिवशंकर लिंग ने पिता की धार्मिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपने दायित्व का निर्वहन किया। उनका यह त्याग बताता है कि हिमालय की धार्मिक परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, अनुशासन और समर्पण की गहरी भावना भी जुड़ी है।



