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संत परंपरा को अपूरणीय क्षति, माई शंकर गिरि ब्रह्मलीन, त्रिपुरेश्वर महादेव मंदिर की महंत के निधन से शोक में डूबी मंदाकिनी घाटी

त्रिपुरेश्वर महादेव मंदिर की महंत के निधन से शोक में डूबी मंदाकिनी घाटी, अंतिम दर्शन को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

रुद्रप्रयाग। मंदाकिनी घाटी की आध्यात्मिक चेतना और संत परंपरा को मंगलवार सुबह गहरा आघात लगा। तिलवाड़ा स्थित प्राचीन त्रिपुरेश्वर महादेव मंदिर की महंत माई शंकर गिरि ब्रह्मलीन हो गईं। उनके निधन का समाचार फैलते ही तिलवाड़ा समेत पूरी मंदाकिनी घाटी में शोक की लहर दौड़ गई। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं तो संत समाज ने उनके निधन को धार्मिक, आध्यात्मिक और संत परंपरा के लिए ऐसी क्षति बताया, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।

माई शंकर गिरि लंबे समय से त्रिपुरेश्वर महादेव मंदिर की साधना, सेवा और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी थीं। शिव भक्ति और साधना को उन्होंने अपने जीवन का आधार बनाया। उनका जीवन सादगी, तप, त्याग और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक रहा। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए वह केवल महंत ही नहीं, बल्कि आस्था, मार्गदर्शन और आध्यात्मिक संबल का केंद्र थीं।

बताया जाता है कि माई शंकर गिरि ने मंदिर की धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ ही श्रद्धालुओं को शिव आराधना और सनातन परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सहज, सरल और आत्मीय व्यवहार के कारण स्थानीय लोगों से लेकर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं तक में उनके प्रति गहरी श्रद्धा थी। मंदिर परिसर में उनकी उपस्थिति ही श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराती थी।

मंगलवार सुबह उनके ब्रह्मलीन होने की खबर जैसे ही क्षेत्र में पहुंची, लोग स्तब्ध रह गए। देखते ही देखते त्रिपुरेश्वर महादेव मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। हर कोई अपनी श्रद्धांजलि देने और अंतिम दर्शन करने के लिए मंदिर पहुंचा। वातावरण में ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच गमगीन माहौल बना रहा।

संत समाज, श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने माई शंकर गिरि को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान शिव की भक्ति और धार्मिक सेवा को समर्पित किया। उनका जाना केवल एक संत का देहावसान नहीं, बल्कि मंदाकिनी घाटी की जीवंत संत परंपरा के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अवसान है।

माई शंकर गिरि की स्मृतियां अब त्रिपुरेश्वर महादेव मंदिर और मंदाकिनी घाटी की धार्मिक चेतना में हमेशा जीवित रहेंगी। उनकी साधना, सादगी और शिव के प्रति अटूट आस्था आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देती रहेगी। श्रद्धालुओं ने भगवान त्रिपुरेश्वर महादेव से दिवंगत संतात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देने और शोकाकुल संत समाज एवं अनुयायियों को यह अपार दुख सहने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।

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