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बाल पर्व फुलारी का घोगा विसर्जन व सामूहिक भोज के साथ हुआ समापन

लक्ष्मण सिंह नेगी।

ऊखीमठ। मास की संक्रान्ति से शुरू हुए बाल पर्व फुलारी का समापन घोगा विसर्जन व सामूहिक भोज के साथ हो गया है। देवभूमि उत्तराखंड मे युगो से चली परम्परानुसार के अनुसार प्रति वर्ष चैत्र मास की संक्रान्ति से लेकर आठ गते तक नौनिहालो द्वारा ब्रह्म बेला पर फ्यूली , बुरांस सहित अनेक प्रजाति के पुष्प विखेरकर बसन्त आगमन का सन्देश दिया जाता है तथा नौनिहालो मे उत्साह व उमंग बना रहता है। फुलारी महोत्सव मे घोगा नृत्य मुख्य आकर्षण का केंद्र होता है । फुलारी नौनिहालो के घर आगमन पर ग्रामीणो द्वारा गुड़ , दाल चावल देने की परम्परा आज भी जीवित है। बाल पर्व के आठवे दिन घोगा विसर्जित व सामूहिक भोज के साथ बाल पर्व का समापन हो गया है।

वर्तमान समय मे सभी नौनिहाल बाल पर्व फुलारी त्यौहार मे बढ़ – चढ़कर भागीदारी कर रहे है। चैत्र मास की संक्रान्ति से लेकर आठ गते तक फुलारी नौनिहालो द्वारा गांवों में घर – घर की चौखट पर ब्रह्म बेला में पहुंचकर अनेक प्रकार के गीतो के गायन से गांवो का माहौल भक्तिमय व संगीतमय बना रखा है तथा हर घर मे फुलारी नौनिहालो का इन्तजार बेसब्री से किया जाता है। केदार घाटी के अगस्तमुनि, तुंगनाथ घाटी एवं गुप्तकाशी मे फुलारी महोत्सव व फुलारी त्यौहार की प्रतियोगिता भी करायी जाती रही है जिनमे असंख्य फुलारी की टीमे प्रतिभाग करती है। नगर पंचायत अध्यक्ष कुब्जा धर्म्वाण ने बताया कि बाल पर्व फुलारी त्यौहार की परम्परा केदार घाटी मे युगो पूर्व की है तथा फुलारी त्यौहार के आगमन से नौनिहालो मे उत्साह व उमंग देखने को मिलती है। उन्होने बताया कि फुलारी नौनिहालो का ब्रह्म बेला पर घर आगमन व घरो की चौखटो मे अनेक प्रजाति के पुष्प बिखेरना शुभ माना जाता है। आचार्य रामकृष्ण जमलोकी ने बताया युगों से चली आ रही बाल पर्व के इस त्यौहार की परंपरा को गांव के बाल चैत्र की संक्रांति से मना रहे हैं, सनातन संस्कृति बच्चों में बालपन से बनी रहे इसी लिए हमारे वृद्ध जनों ने इस परंपरा को बढ़ाया है, वर्तमान समय में भी बच्चे प्रातः ब्रह्मबेला पर घर घर जाकर चौखट में बुरांस फ्यूंली सहित अन्य प्राकृतिक पुष्पों को डालकर मधुर गायन करते हैं।

निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य रीना बिष्ट ने बताया कि दशको पूर्व चैत्र मास मे जागरो की परम्परा थी मगर जागरो की परम्परा धीरे – धीरे विलुप्त हो चुकी है मगर नौनिहालो द्वारा बाल पर्व फुलारी त्यौहार की परम्परा को जीवित रखा गया है । समाज सेविका सुमन जमलोकी ने बताया की साहित्यकारो व संगीतकारो ने भी बाल पर्व फुलारी त्यौहार व चैत्र मास मे संचालित होने वाली परम्पराओ का गुणगान बड़े मार्मिक तरीके से किया है । निवर्तमान प्रधान बुरूवा सरोज भट्ट ने बताया कि चैत्र मास की परम्परा पर आधारित गीतो को सुनने की लालसा आज भी मन मे बनी रहती है । निवर्तमान प्रधान पाली सरूणा प्रेमलता पन्त ने बताया कि बाल पर्व फुलारी त्यौहार के समापन पर आयोजित सामूहिक भोज मे आत्मीयता झलकती है तथा नौनिहालो व ग्रामीणो मे आपसी सौहार्द बना रहता है ।

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