
दहकते अंगारों पर नृत्य कर जाख देवता ने दिया भक्तों को आशीर्वाद
गुप्तकाशी। केदारघाटी के जाखधार गुप्तकाशी में आस्था, आध्यात्म का मेला जिसमें नर पश्र्वा के दहकते अंगारों पर नृत्य कर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। इस बार भगवान जाख ने तीन बार अग्निकुंड में प्रवेश किया।
वर्षों से इस मंदिर में विशाल अग्निकुंड के धधकते अंगारों पर नर पाश्र्व नृत्य करके श्रद्धालुओं की बालाएं लेते हैं। यह संभवत इतिहास का पहले ऐसा मेला है, जहां पर विशाल अग्निकुंड के अंगारों पर मानव द्वारा ढोल दमाऊ , भोंपू तथा जाख देवता के जयकारों के बीच देव नृत्य करता है। रोंगटे खड़े करने वाले इस दृश्य को देखकर वैज्ञानिक भी हतप्रभ हैं।
बरसों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन करते हुए नर देवता को उनके मूल गांव से देवशाल स्थित विंध्यवासिनी मंदिर तक पहुंचाया जाता है, जहां पर विंध्यवासिनी मंदिर की परिक्रमाएं पूर्ण कर जाख की कंडी और जलते दिए के पीछे जाख मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। मंदिर पहुंचने के बाद कुछ देर बांज के पेड़ के नीचे ढोल सागर की थाप पर देवता अवतरित होते हैं। देव स्वरूप में आने के बाद मंदिर में पहुंचकर देव को तांबे की गागर में भरे हुए पुण्य जल से स्नान करवाते हैं। इसके बाद पूरे वेग से नर देव देखते ही देखते दहकते अंगारों पर तीन बार नृत्य करने के बाद लोगों को आशीर्वाद देते हैं।
गुप्तकाशी से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जाख मंदिर अवस्थित है। जिसे भगवान यक्ष के रूप में भी जाना जाता है।
मेले से पूर्व कई दिनों से नारायणकोटी, देवशाल और कोठड़ा के भक्तों द्वारा पूजा पद्धति के अनुसार मंदिर के सामने विशाल अग्नि कुंड का निर्माण करते हैं । संक्रांति के दिन रात्रि भर विशाल अग्निकुंड में लड़कियों को एकत्रित कर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। रात्रि जागरण कर भगवान जाख के जयकारे और भजन गाए जाते हैं। दो प्रविष्ट वैशाख को प्रातः काल अग्निकुंड से विशाल लकड़ियों को निकाला जाता है। और लाल अंगारों को अग्निकुंड में ही छोड़ जाता है। जिस पर कई जोड़ी ढोल द्वारा ढोल सागर की थाप, भोपू और जाख के जयकारों के साथ भगवान जाख़ मानव रूप में अवतरित होकर इस कुंड में कूद पड़ते हैं। मेले के दौरान हजारों श्रद्धालूं ने यहां लगी दुकानों से खरीदारी भी की।



