भगवती राकेश्वरी महात्म्य’ में मद्महेश्वर घाटी की धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत

रांसी की तपस्थली से गूंजेगी मां राकेश्वरी की महिमा
फाटा(रूद्रप्रयाग)। हिमालय की सुरम्य गोद में स्थित मद्महेश्वर घाटी की समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत अब पुस्तक के पन्नों में संरक्षित होकर देश-दुनिया के श्रद्धालुओं और पर्यटकों तक पहुंचेगी। रांसी गांव की पावन धरती पर जगत कल्याण की भावना से तपस्यारत मां चन्द्रकल्याणी भगवती राकेश्वरी की धार्मिक महत्ता के साथ ही रांसी गांव और संपूर्ण मद्महेश्वर घाटी की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं पौराणिक परंपराओं को समेटे ‘भगवती राकेश्वरी महात्म्य’ पुस्तक का शीघ्र प्रकाशन होने जा रहा है। संस्कृति प्रकाशन अगस्त्यमुनि और केदार घाटी के पत्रकार लक्ष्मण सिंह नेगी के प्रयासों से प्रकाशित होने वाली यह कृति क्षेत्र की लोक आस्था और धार्मिक विरासत को अक्षरों में संजोने की महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
चन्द्रकल्याणी राकेश्वरी आंठ गांव जूला मंदिर समिति के अध्यक्ष मदन भट्ट ने बताया कि पुस्तक में मां चन्द्रकल्याणी भगवती राकेश्वरी की महिमा के साथ ही भगवान मद्महेश्वर, बूढ़ा मद्महेश्वर, भेड़ पालकों की आराध्य देवी मनणामाई तीर्थ, सिद्धपीठ कालीशिला सहित मद्महेश्वर घाटी के अनेक धार्मिक एवं पर्यटक स्थलों का विस्तृत संकलन किया गया है। इन स्थलों से जुड़ी लोक मान्यताओं, पौराणिक आख्यानों, धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक महत्व को पुस्तक में प्रमुखता से स्थान दिया गया है।
उन्होंने बताया कि मद्महेश्वर घाटी का प्रत्येक पड़ाव अपने भीतर आस्था और लोक संस्कृति की अनूठी गाथा समेटे हुए है। रांसी गांव को मां राकेश्वरी की पावन तपस्थली के रूप में विशेष धार्मिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। यहां की देवी आराधना, धार्मिक अनुष्ठान और लोक परंपराएं आज भी ग्रामीण जीवन की आत्मा बनी हुई हैं। इसी आस्था की परंपरा को व्यापक संदर्भ प्रदान करने का प्रयास ‘भगवती राकेश्वरी महात्म्य’ पुस्तक में किया गया है।
पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने बताया कि पुस्तक में भगवान मद्महेश्वर के पावन धाम और उससे जुड़े धार्मिक संदर्भों के साथ बूढ़ा मद्महेश्वर की आध्यात्मिक महत्ता को भी रेखांकित किया गया है। वहीं मनणामाई तीर्थ से जुड़ी भेड़ पालक समाज की आस्था तथा सिद्धपीठ कालीशिला की धार्मिक मान्यताओं को भी स्थान दिया गया है। इस प्रकार यह कृति केवल एक देवी की महिमा तक सीमित न रहकर संपूर्ण घाटी की धार्मिक चेतना, लोक विश्वास और सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज बनने जा रही है।
प्रधान रांसी सोनिया पंवार ने कहा कि पर्वतीय अंचलों की मौखिक परंपराओं में पीढ़ियों से संरक्षित धार्मिक आख्यान और लोक मान्यताएं आधुनिक दौर में दस्तावेजीकरण की मांग कर रही हैं। ऐसे समय में ‘भगवती राकेश्वरी महात्म्य’ पुस्तक का प्रकाशन आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। पुस्तक श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक जानकारी का माध्यम बनने के साथ ही शोधार्थियों, संस्कृति प्रेमियों और पर्यटकों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
बद्री केदार मन्दिर समिति पूर्व सदस्य शिव सिंह रावत ने बताया कि पत्रकार लक्ष्मण सिंह नेगी द्वारा लंबे समय से मदमहेश्वर घाटी और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों की धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपराओं को लेखनी के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। ‘भगवती राकेश्वरी महात्म्य’ पुस्तक इसी सतत प्रयास की महत्वपूर्ण कड़ी है। पुस्तक में क्षेत्र की उन परंपराओं और स्थलों को शब्द देने का प्रयास किया गया है, जिनमें हिमालयी समाज की आस्था, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और लोक संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।
प्रधान उनियाणा बिशाम्बरी देवी ने कहा कि आज के बदलते परिवेश में जब नई पीढ़ी अपनी पारंपरिक जड़ों से दूर होती जा रही है, तब धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को पुस्तकों के माध्यम से संरक्षित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ‘भगवती राकेश्वरी महात्म्य’ पुस्तक के प्रकाशन से रांसी गांव की तपस्थली मां राकेश्वरी की महिमा के साथ ही मद्महेश्वर घाटी की अनूठी धार्मिक पहचान व्यापक स्तर पर सामने आएगी।
सामाजिक कार्यकर्ता रणजीत रावत ने कहा कि हिमालय की ऊंची चोटियों, बुग्यालों, तीर्थों और देवस्थलों के बीच विकसित हुई यहां की संस्कृति केवल स्थानीय समाज की धरोहर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। पुस्तक इसी विरासत को शब्दों में सहेजकर श्रद्धालुओं और संस्कृति प्रेमियों तक पहुंचाने का माध्यम बनेगी।



