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रासी गांव में पौराणिक जागरों की धूम, दो माह तक गूंजती है देवी-देवताओं की महिमा 

लक्ष्मण सिंह नेगी

ऊखीमठ। मद्महेश्वर घाटी स्थित भगवती राकेश्वरी की तपस्थली रासी गांव इन दिनों पौराणिक जागरों की दिव्य स्वर-लहरियों से गुंजायमान है। देवभूमि उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति, धार्मिक परम्पराओं और लोक आस्था का अद्भुत संगम यहां प्रतिदिन देखने को मिल रहा है। गांव के प्राचीन राकेश्वरी मन्दिर परिसर में आयोजित पौराणिक जागरों में दूर-दूर से श्रद्धालु एवं ग्रामीण बड़ी संख्या में पहुंचकर देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। लोक परम्परा के अनुसार प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इन पौराणिक जागरों में हरि के द्वार हरिद्वार से लेकर चौखम्भा हिमालय तक विराजमान देवी-देवताओं, सिद्धों, ऋषि-मुनियों, लोकदेवताओं तथा शक्तिपीठों की महिमा का भावपूर्ण गुणगान किया जाता है। जागर गायक पारंपरिक ढोल-दमाऊं की मधुर थाप और लोक वाद्यों के साथ देवी-देवताओं के आवाहन, उनकी लीलाओं, तप, त्याग एवं लोक कल्याण की कथाओं का गायन करते हैं। वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठता है और श्रद्धालु श्रद्धा एवं भक्ति में सराबोर हो जाते हैं।
राकेश्वरी मन्दिर समिति कार्यकारी अध्यक्ष मदन भट्ट ने बताया कि रासी गांव का यह धार्मिक आयोजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप माना जाता है। लगभग दो माह तक चलने वाले इन पौराणिक जागरों में प्रतिदिन स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु भाग लेते हैं। लोकगाथाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, इतिहास, देवी-देवताओं की परम्पराओं और लोक मान्यताओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी यह आयोजन करता है।
पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने बताया कि जागर गायन के दौरान भगवान बदरी-विशाल, केदारनाथ, पंचकेदार, चौखम्भा हिमालय, नंदा, राजराजेश्वरी, क्षेत्रपाल, भैरव, नागराजा तथा विभिन्न लोक देवताओं की महिमा का विस्तार से वर्णन किया जाता है। श्रद्धालु इसे देवी-देवताओं से सीधा आध्यात्मिक संवाद मानते हैं। पूरे क्षेत्र में भक्ति, श्रद्धा और लोकसंस्कृति का अनूठा वातावरण बना रहता है।
शिक्षाविद रविन्द्र भट्ट ने बताया कि युगों से चली आ रही परम्परा के अनुसार आश्विन मास की दो गते को भगवती राकेश्वरी को हिमालय से लाए गए पवित्र ब्रह्मकमल अर्पित किए जाते हैं। इसी विशेष पूजा-अर्चना के साथ दो माह से चल रहे पौराणिक जागरों का विधिवत समापन होता है। इस अवसर पर विशेष हवन, पूजा, आरती एवं प्रसाद वितरण का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर सुख, समृद्धि और लोककल्याण की कामना करते हैं। मुख्य जागरी पूर्ण सिंह पंवार का कहना है कि रासी गांव की यह परम्परा सदियों से निरंतर चली आ रही है और आज भी पूरी आस्था एवं विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है। उनका मानना है कि पौराणिक जागर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण का सशक्त माध्यम हैं। यही कारण है कि हर वर्ष इस आयोजन में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है और रासी गांव एक बार फिर देवभक्ति, लोकआस्था और सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केन्द्र बन गया है।

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